सांसारिक जीवन सतह पर होता है। इसका इतनी गहनता से आनंद लिया जाना चाहिए कि तुम्हें इसमें पवित्रता, दिव्यता मालूम पड़ने लगे। दिव्य और कुछ नहीं बस इतना ही है कि इस क्षण में, इस दुनिया में, इस जीवन में, इस शरीर में गहरे उतरना।
Tuesday, November 19, 2019
प्रश्न : आप कहते हैं सब उसकी मर्जी पर छोड़ दें।
🔴प्रश्न : आप कहते हैं सब उसकी मर्जी पर छोड़ दें। मगर यह कैसे पता चले कि कौन—सी हमारी मर्जी है और कौन—सी उसकी मर्जी है?
खूब मजे की बात कर रहे हो! अपनी मर्जी अभी भी बचाए हुए हो! पुराने संस्कार बाधा डालते हैं। पुराने संस्कार कहते हैं कि यह तो ठीक बात है—सब उसकी मर्जी पर छोड़ दें। मगर यह कैसे पता चलेगा कि यह मर्जी हमारी है कि उसकी?
तुम हो ही नहीं, वही है; तुम्हारी मर्जी हो कैसे सकती है? तुम मेरी बात समझ नहीं पाते, क्योंकि वे सारे जाल जो तुम्हारे चित्त में बैठे हैं, उनके बीच से ही मेरी बात को गुजरना पड़ता है। वह जाल मेरी बात को विकृत कर देता है। मैं कह रहा था—उसके सिवाय और कुछ है ही नहीं; उसकी ही मर्जी है। अब तुम्हारे सामने एक नया सवाल खड़ा हो गया कि यह पक्का कैसे पता चलेगा कि यह उसकी मर्जी है कि मेरी मर्जी है? तुम हो ही नहीं, इसलिए जो भी है उसी की मर्जी है।
नए—नए सवाल उठते जाएंगे तुम्हारे भीतर, क्योंकि धारणाएं तैयार हैं, अभी गई नहीं हैं। तो सवाल उठेगा, फिर कोई बुरा काम करने का सवाल उठा, फिर मैं क्या करूंगा? जैसे कि चोरी करने का सवाल उठा, फिर मैं क्या करूंगा? जिसने सच में सब कुछ छोड़ दिया है, वह चोरी का ख्याल भी उसी पर छोड़ेगा। वह कहेगा—तेरी मर्जी, चोरी करवाना है, चोरी करवा।
इसका यह मतलब नहीं है कि चोरी में पकड़े नहीं जाओगे। क्योंकि परमात्मा ने करवाई, तो पकड़े क्यों गए? अब पकड़ाए जाना भी उसकी मर्जी है, तो पकड़े गए। इसका यह मतलब नहीं है कि मजिस्ट्रेट छोड़ देगा; कि हमने तो परमात्मा की मर्जी से किया था। मजिस्ट्रेट में भी उसी की मर्जी है।
एक सदगुरु के पास एक शिष्य वर्षों रहा, रहा होगा योग चिन्मय जैसा शिष्य! वह सुनता था कि सबमें परमात्मा है, कण—कण में उसी का वास है। एक दिन राह पर भीख मांगने गया था, एक पागल हाथी भागा उस गरीब शिष्य की तरफ। मगर उसने सोचा कि गुरु कहते हैं, आज प्रयोग ही करके देख लें कि सबमें उसी का वास है। कण—कण में है, तो इतने बड़े हाथी में तो होगा ही, निश्चित होगा, बड़ी मात्रा में होगा। गणित ऐसा ही चलता है, कि जब कण—कण में है तो इस हाथी में तो सोचो कितना नहीं होगा। एकदम लबालब भरा है! खड़ा ही रहा! डर तो लगा बहुत। भीतर से कई बार भाव भी उठा कि भाग जाऊं। उसने कहा लेकिन आज अपनी नहीं सुनना है। भीतर बहुत बार चित्त हुआ कि भाग जाऊं, यह मार डालेगा। यह चला आ रहा है बिलकुल पागल; पता नहीं रुकेगा कि नहीं रुकेगा! मगर उसने कहा, अब आज प्रयोग ही करके देख लें, जब वही है। महावत भी चिल्ला रहा है हाथी का कि भाई, रास्ता हट। भाग जा, पागल है हाथी। बच जा कहीं भी। दुकान में प्रवेश कर जा। आसपास के किसी भी मकान में छिप जा। मगर उसने कहा कि चिल्लाते रहो! महावत की कौन सुने, जब वही सब में है।
जो होना था वह हुआ, हाथी ने उसे बांधा अपनी सूंड़ में और फेंका। कोई तीस गज दूर जाकर गिरा। हड्डी—पसली चकनाचूर हो गई। बड़ा दुखी हुआ कि यह क्या मामला है? कण—कण में उसी का वास, इतने बड़े हाथी में नहीं! लंगड़ाता, टूटा—फूटा वापिस गुरु के पास पहुंचा, बोला कि सब वेदांत व्यर्थ, सब बकवास है! कण—कण में क्या, हाथी में भी उसका वास नहीं है।
गुरु ने पूछा: लेकिन महावत ने कुछ कहा था?
कहा: हां चिल्ला रहा था कि पागल है।
और तेरे हृदय में कुछ हुआ था?
कहा: हां, हृदय भी चिल्ला रहा था कि हाथी पागल है। मगर मैंने कहा, एक बार तो प्रयोग करके देख लें! उसकी मर्जी।
उस गुरु ने कहा: महावत में भी उसी की मर्जी थी, और तेरे भीतर भी वही चिल्ला रहा था। अगर तूने उसकी ही मर्जी सुनी होती, तो तू भाग गया होता। तूने उसकी नहीं सुनी। और हाथी तुझसे कह नहीं रहा था कि रास्ते पर खड़ा रह। महावत कह रहा था, भाग जा। तेरा हृदय कह रहा था, भाग जा। और हाथी कुछ कह नहीं रहा था। हाथी की तूने सुनी, जो कुछ कह ही नहीं रहा था। हाथी कह नहीं रहा था कि भाई, खड़े रहो, कहां जा रहे हो? जरा मुलाकात करनी है। कहां जाते हो, हाथ तो मिला लो, जय राम जी तो हो जाने दो। हाथी तो कुछ बोल ही नहीं रहा था। जो नहीं बोल रहा था उसकी तूने सुनी! और तेरा हृदय जोर—जोर से चिल्ला रहा था।
उसने कहा: हां, बहुत जोर—जोर से चिल्ला रहा था कि हट जाओ, भाग जाओ। जान ले लेगा यह। कहां के वेदांत में पड़े हो! फिर कभी प्रयोग कर लेना, आज ही क्या जिद्द ठानी है! और महावत भी चिल्ला रहा था। आसपास के लोग भी चिल्ला रहे थे सड़क के कि भाई, बीच में क्यों खड़ा है रास्ते के, भाग जा।
गुरु ने कहा: सारा संसार चिल्ला रहा था...!
मजिस्टे्रट सजा देगा। लेकिन तब जिसने सब उस पर छोड़ दिया है, वह सजा भी स्वीकार करेगा—उसी की सजा है। उसी ने चोरी करवाई। उसी ने चोरी की। उसी का धन था, जिसकी चोरी की गई। वही मजिस्ट्रेट में है। जिसने सब उस पर छोड़ा, उसका अर्थ यह होता है कि अब मेरी मर्जी जैसी कोई चीज ही नहीं है। अब जो होगा, जैसा होगा। यह बड़ी गहन अवस्था की बात है।
तुम हिसाब लगाते हो कि इसमें मेरी मर्जी कहां है, उसकी मर्जी कहां है? जैसे कि दो मर्जी हो सकती हैं। लहर की कोई मर्जी होती है? मर्जी तो सब सागर की होती है। क्षण—भर को लहर उठती है, नाचती है, गीत गा लेती है, शोरगुल मचा लेती है, फिर खो जाती है। मगर जब लहर नाचती है उत्तुंग, हवाओं से बात करती है, बादलों को छूने की आकांक्षा रखती है, तब भी सागर की ही मर्जी है।
ऐसा जान लेने वाला निर्विचार हो जाता है। तो फिर यह सवाल नहीं उठता कि ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? वैसा क्यों नहीं हो रहा है? फिर जैसा हो रहा है, यही उसकी मर्जी है। अगर उसके मन में यही है कि मेरे हाथ में कंकड़—पत्थर ही रहें, हीरे—जवाहरात नहीं, तो कंकड़—पत्थर ही ठीक। तो कंकड़—पत्थर हीरे—जवाहरात हैं, क्योंकि उसकी मर्जी है। उसकी मर्जी से ज्यादा मूल्यवान थोड़े ही हीरे—जवाहरात होते हैं। उसकी मर्जी से हो, तो मौत भी जीवन है। उसकी मर्जी से हो, तो जहर भी अमृत है।
तुम्हारा कूड़ा—करकट जाने दो, आने दो मेरी बाढ़। और तुम्हारे भीतर जल्दी ही, जैसे ही समाज के द्वारा दिए गए संस्कार बह जाएंगे, ज्योति जलेगी।
तुम हो ही नहीं, वही है; तुम्हारी मर्जी हो कैसे सकती है? तुम मेरी बात समझ नहीं पाते, क्योंकि वे सारे जाल जो तुम्हारे चित्त में बैठे हैं, उनके बीच से ही मेरी बात को गुजरना पड़ता है। वह जाल मेरी बात को विकृत कर देता है। मैं कह रहा था—उसके सिवाय और कुछ है ही नहीं; उसकी ही मर्जी है। अब तुम्हारे सामने एक नया सवाल खड़ा हो गया कि यह पक्का कैसे पता चलेगा कि यह उसकी मर्जी है कि मेरी मर्जी है? तुम हो ही नहीं, इसलिए जो भी है उसी की मर्जी है।
नए—नए सवाल उठते जाएंगे तुम्हारे भीतर, क्योंकि धारणाएं तैयार हैं, अभी गई नहीं हैं। तो सवाल उठेगा, फिर कोई बुरा काम करने का सवाल उठा, फिर मैं क्या करूंगा? जैसे कि चोरी करने का सवाल उठा, फिर मैं क्या करूंगा? जिसने सच में सब कुछ छोड़ दिया है, वह चोरी का ख्याल भी उसी पर छोड़ेगा। वह कहेगा—तेरी मर्जी, चोरी करवाना है, चोरी करवा।
इसका यह मतलब नहीं है कि चोरी में पकड़े नहीं जाओगे। क्योंकि परमात्मा ने करवाई, तो पकड़े क्यों गए? अब पकड़ाए जाना भी उसकी मर्जी है, तो पकड़े गए। इसका यह मतलब नहीं है कि मजिस्ट्रेट छोड़ देगा; कि हमने तो परमात्मा की मर्जी से किया था। मजिस्ट्रेट में भी उसी की मर्जी है।
एक सदगुरु के पास एक शिष्य वर्षों रहा, रहा होगा योग चिन्मय जैसा शिष्य! वह सुनता था कि सबमें परमात्मा है, कण—कण में उसी का वास है। एक दिन राह पर भीख मांगने गया था, एक पागल हाथी भागा उस गरीब शिष्य की तरफ। मगर उसने सोचा कि गुरु कहते हैं, आज प्रयोग ही करके देख लें कि सबमें उसी का वास है। कण—कण में है, तो इतने बड़े हाथी में तो होगा ही, निश्चित होगा, बड़ी मात्रा में होगा। गणित ऐसा ही चलता है, कि जब कण—कण में है तो इस हाथी में तो सोचो कितना नहीं होगा। एकदम लबालब भरा है! खड़ा ही रहा! डर तो लगा बहुत। भीतर से कई बार भाव भी उठा कि भाग जाऊं। उसने कहा लेकिन आज अपनी नहीं सुनना है। भीतर बहुत बार चित्त हुआ कि भाग जाऊं, यह मार डालेगा। यह चला आ रहा है बिलकुल पागल; पता नहीं रुकेगा कि नहीं रुकेगा! मगर उसने कहा, अब आज प्रयोग ही करके देख लें, जब वही है। महावत भी चिल्ला रहा है हाथी का कि भाई, रास्ता हट। भाग जा, पागल है हाथी। बच जा कहीं भी। दुकान में प्रवेश कर जा। आसपास के किसी भी मकान में छिप जा। मगर उसने कहा कि चिल्लाते रहो! महावत की कौन सुने, जब वही सब में है।
जो होना था वह हुआ, हाथी ने उसे बांधा अपनी सूंड़ में और फेंका। कोई तीस गज दूर जाकर गिरा। हड्डी—पसली चकनाचूर हो गई। बड़ा दुखी हुआ कि यह क्या मामला है? कण—कण में उसी का वास, इतने बड़े हाथी में नहीं! लंगड़ाता, टूटा—फूटा वापिस गुरु के पास पहुंचा, बोला कि सब वेदांत व्यर्थ, सब बकवास है! कण—कण में क्या, हाथी में भी उसका वास नहीं है।
गुरु ने पूछा: लेकिन महावत ने कुछ कहा था?
कहा: हां चिल्ला रहा था कि पागल है।
और तेरे हृदय में कुछ हुआ था?
कहा: हां, हृदय भी चिल्ला रहा था कि हाथी पागल है। मगर मैंने कहा, एक बार तो प्रयोग करके देख लें! उसकी मर्जी।
उस गुरु ने कहा: महावत में भी उसी की मर्जी थी, और तेरे भीतर भी वही चिल्ला रहा था। अगर तूने उसकी ही मर्जी सुनी होती, तो तू भाग गया होता। तूने उसकी नहीं सुनी। और हाथी तुझसे कह नहीं रहा था कि रास्ते पर खड़ा रह। महावत कह रहा था, भाग जा। तेरा हृदय कह रहा था, भाग जा। और हाथी कुछ कह नहीं रहा था। हाथी की तूने सुनी, जो कुछ कह ही नहीं रहा था। हाथी कह नहीं रहा था कि भाई, खड़े रहो, कहां जा रहे हो? जरा मुलाकात करनी है। कहां जाते हो, हाथ तो मिला लो, जय राम जी तो हो जाने दो। हाथी तो कुछ बोल ही नहीं रहा था। जो नहीं बोल रहा था उसकी तूने सुनी! और तेरा हृदय जोर—जोर से चिल्ला रहा था।
उसने कहा: हां, बहुत जोर—जोर से चिल्ला रहा था कि हट जाओ, भाग जाओ। जान ले लेगा यह। कहां के वेदांत में पड़े हो! फिर कभी प्रयोग कर लेना, आज ही क्या जिद्द ठानी है! और महावत भी चिल्ला रहा था। आसपास के लोग भी चिल्ला रहे थे सड़क के कि भाई, बीच में क्यों खड़ा है रास्ते के, भाग जा।
गुरु ने कहा: सारा संसार चिल्ला रहा था...!
मजिस्टे्रट सजा देगा। लेकिन तब जिसने सब उस पर छोड़ दिया है, वह सजा भी स्वीकार करेगा—उसी की सजा है। उसी ने चोरी करवाई। उसी ने चोरी की। उसी का धन था, जिसकी चोरी की गई। वही मजिस्ट्रेट में है। जिसने सब उस पर छोड़ा, उसका अर्थ यह होता है कि अब मेरी मर्जी जैसी कोई चीज ही नहीं है। अब जो होगा, जैसा होगा। यह बड़ी गहन अवस्था की बात है।
तुम हिसाब लगाते हो कि इसमें मेरी मर्जी कहां है, उसकी मर्जी कहां है? जैसे कि दो मर्जी हो सकती हैं। लहर की कोई मर्जी होती है? मर्जी तो सब सागर की होती है। क्षण—भर को लहर उठती है, नाचती है, गीत गा लेती है, शोरगुल मचा लेती है, फिर खो जाती है। मगर जब लहर नाचती है उत्तुंग, हवाओं से बात करती है, बादलों को छूने की आकांक्षा रखती है, तब भी सागर की ही मर्जी है।
ऐसा जान लेने वाला निर्विचार हो जाता है। तो फिर यह सवाल नहीं उठता कि ऐसा क्यों नहीं हो रहा है? वैसा क्यों नहीं हो रहा है? फिर जैसा हो रहा है, यही उसकी मर्जी है। अगर उसके मन में यही है कि मेरे हाथ में कंकड़—पत्थर ही रहें, हीरे—जवाहरात नहीं, तो कंकड़—पत्थर ही ठीक। तो कंकड़—पत्थर हीरे—जवाहरात हैं, क्योंकि उसकी मर्जी है। उसकी मर्जी से ज्यादा मूल्यवान थोड़े ही हीरे—जवाहरात होते हैं। उसकी मर्जी से हो, तो मौत भी जीवन है। उसकी मर्जी से हो, तो जहर भी अमृत है।
तुम्हारा कूड़ा—करकट जाने दो, आने दो मेरी बाढ़। और तुम्हारे भीतर जल्दी ही, जैसे ही समाज के द्वारा दिए गए संस्कार बह जाएंगे, ज्योति जलेगी।
संन्यास से मिलता है सौंदर्य
संन्यासी अपूर्व सुंदर हो जाता है। संन्यास जैसा सौंदर्य देता है, मनुष्य को और कोई चीज नहीं देती। संन्यस्त होकर तुम सुंदर न हो जाओ तो समझना कि कोई भूल-चूक हो रही है। संन्यासी का कोई श्रृंगार नहीं है। संन्यास इतना बड़ा श्रृंगार है कि फिर किसी और श्रृंगार की कोई जरूरत नहीं है।तुमने देखा कि सांसारिक व्यक्ति भोगी है। जवानी में शायद सुंदर होता हो, लेकिन जैसे-जैसे बुढ़ापा आने लगता है, असुंदर होने लगता है। लेकिन उससे उलट घटना घटती है संन्यासी के जीवन में; जैसे-जैसे संन्यासी वृद्ध होने लगता है, वैसे-वैसे और सुंदर होने लगता है। क्योंकि संन्यास की कोई वृद्धावस्था होती ही नहीं, संन्यास कभी बूढ़ा होता नहीं। संन्यास तो चिर-युवा है। इसलिए तो हमने बुद्ध और महावीर की जो मूर्तियां बनाई हैं, वह उनकी युवावस्था की बनाई हैं। इस बात की खबर देने के लिए कि संन्यासी चिर-युवा है। हमने अपूर्व सौंदर्य से भरी मूर्तियां बनाई हैं महावीर और बुद्ध की। उनके पास कुछ भी नहीं है, न कोई साज है, न श्रृंगार है। कृष्ण को तो सुविधा है, कृष्ण की मूर्ति को तो हम सजा लेते हैं, मोरमुकुट बांध देते हैं, रेशम के वस्त्र पहना देते हैं, घुंघरू पहना देते हैं, हाथ में कंगन डालकर मोतियों का हार लटका देते हैं, पर बुद्ध और महावीर के पास तो कुछ भी नहीं है। बुद्ध के पास तो एक चीवर है, जिसको ओढ़ा हुआ है, महावीर के पास तो वह भी नहीं, लेकिन फिर भी अपूर्व सौंदर्य है। ऐसा सौंदर्य, जिसको किसी सजावट की कोई जरूरत नहीं। संसार तो छोड़ना है, संसार की माया-ममता भी छोड़नी है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि संन्यास कठोर बना दे तुम्हें, कृपण बना दे तुम्हें, कि तुम्हारे हृदय को पत्थर बना दे, तब तो तुम चूक गए।
अकसर ऐसा होता है। अकसर तुम्हारे तथाकथित साधु-संन्यासी और महात्मा, जिस दिन माया-मोह छोड़ते हैं, संसार का, उसी दिन दया-ममता, दया-करुणा भी छोड़ देते हैं। ये तथाकथित संन्यासी रूखे-सूखे लोग हैं। उन्होंने माया-मोह छोड़ी, उसी दिन से वे डर गए हैं। उन्होंने अपने को सुखा लिया भय के कारण। वे रसहीन हो गए हैं। उन पर न नए पत्ते लगते हैं, न नए फूल आते हैं। इसलिए तो उनके जीवन में तुम्हें सौंदर्य दिखाई न पड़ेगा। उनके जीवन में एक कुरूपता है। मरुस्थल जैसे हैं! चूक गए। रस से थोड़े ही विरोध था। पतंजलि ने कहा न- ‘रसो वै स:’, वह सत्य तो रसमय है, वह परमात्मा तो रस भरा है। संन्यासी रस से थोड़े ही विरुद्ध है! रस संसार में व्यर्थ न बहे, रस दया बनकर बहे, करुणा बन कर बहे, सेवा बन कर बहे; रस तुम्हें भिखारी न बनाए, सम्राट बनाए; याचक न बनाए, दानी बनाए; रस तुम लुटाओ, रस तुम दो। इसलिए जो संन्यास तुम्हें माया-मोह से छुड़ाकर करुणा-दया से भी छुड़ा देता हो, समझना चूक गए। तीर निशाने पर न लगा, गलत जगह लग गया। भूल हो गई। माया-ममता से छुड़ाने का प्रयोजन ही इतना है कि तुम्हारी जीवन-ऊर्जा करुणा बने। माया-ममता छूट गयी और करुणा बनी नहीं, तो संसार भी गया और सत्य भी न मिला। तुम घर के न बचे, न घाट के- तुम कहीं के न रहे। संसार छूट गया है और सत्य मिला नहीं है। बाहर का सौंदर्य छूट गया और भीतर का सौंदर्य मिला नहीं है। अटक गए। रसधार ही सूख गई। मरुस्थल हो गए।
ज्यादा से ज्यादा कुछ कांटे वाले झाड़ पैदा हो जाते हों मरुस्थल में तो हो जाते हों, बस और कुछ नहीं। न ऐसे वृक्ष पैदा होते हैं कि जिनमें किसी राहगीर को छाया मिल सके, न ऐसे वृक्ष पैदा होते हैं कि रसदार फल लगें और किसी की भूख मिट सके। ना ही किसी की क्षुधा मिटती, ना ही किसी की प्यास मिटती, रूखे-सूखे ये लोग और इनकी तुम पूजा किए चले जाते हो! इनकी पूजा खतरनाक है, क्योंकि इनको देख-देखकर धीरे-धीरे तुम भी रूखे-सूखे हो जाओगे।इस देश में यह दुर्भाग्य खूब घटा। इस देश का संन्यासी धीरे-धीरे जीवन की करुणा से ही शून्य हो गया। उसे करुणा ही नहीं आती। लोग मरते हों तो मरते रहें। लोग सड़ते हों तो सड़ते रहें। वह तो कहता, हमें क्या लेना-देना! हम तो संसार छोड़ चुके। संसार छोड़े, वह तो ठीक, लेकिन करुणा छोड़ चुके! तो फिर तुम बुद्ध की करुणा न समझोगे, महावीर की अ¨हसा न समझोगे और क्राइस्ट की सेवा न समझोगे। इसे कसौटी मानकर चलना। करुणा बननी ही चाहिए। तो ही समझना कि संन्यास ठीक दिशा में यात्र कर रहा है।
जो संन्यास तुम्हें माया-मोह से छुड़ाकर करुणा-दया से भी दूर कर देता हो, समझना चूक गए। भूल हो गई। माया-ममता से छुड़ाने का प्रयोजन ही इतना है कि तुम्हारी जीवन-ऊर्जा करुणा बने।
ध्यान(201119)
जब लोग आकर मुझसे पूछते हैं, 'ध्यान कैसे करें?' मैं उन्हें कहता हूं, ‘यह पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है कि ध्यान कैसे करें, बस पूछें कि कैसे स्वयं को खाली रखें। ध्यान सहज घटता है। बस पूछो कि कैसे खाली रहना है, बस इतना ही। यह ध्यान की कुल तरकीब है - कैसे खाली रहना है। तब आप कुछ भी नहीं करेंगे और ध्यान का फूल खिलेगा।
जब तुम कुछ भी नहीं करते तब ऊर्जा केंद्र की तरफ बढ़ती है, यह केंद्र की ओर एकत्रित हो जाती है। जब तुम कुछ करते हो तो ऊर्जा बाहर निकलती है। करना बाहर की ओर जाने का एक मार्ग है। ना करना भीतर की ओर जाने का एक मार्ग है। किसी कार्य को करना पलायन है। तुम बाइबिल पढ़ सकते हो, तुम इसे एक कार्य बना सकते हो। धार्मिक कार्य और धर्मनिरपेक्ष कार्य के बीच कोई अंतर नही है: सभी कार्य, कार्य हैं, और वे तुम्हें तुम्हारी चेतना से बाहर की ओर ले जाने में मदद करते हैं। वे बाहर रहने के लिए बहाने हैं।
मनुष्य अज्ञानी और अंधा है, और वह अज्ञानी और अंधा बने रहना चाहता है, क्योंकि स्वयं के भीतर आना अराजकता में प्रवेश करने की भांती लगता है। और ऐसा ही है; अपने भीतर तुमने एक अराजकता निर्मित कर ली है। तुम्हें इसका सामना करना होगा और इससे होकर गुजरना होगा। साहस की आवश्यकता है – साहस- स्वयं होने का, साहस- भीतर जाने का। ध्यानपूर्वक होने का साहस – इस साहस से बड़ा साहस मैंने नहीं जाना है।
***********************************************************************************************
तो ध्यान क्या है? ध्यान है केवल स्वयं की उपस्थिति में आनंदित होना; ध्यान स्वयं में होने का आनंद है। यह बहुत सरल है - चेतना की पूरी तरह से विश्रांत अवस्था जहां तुम कुछ भी नहीं कर रहे होते। जिस क्षण तुम्हारे भीतर कर्ता भाव प्रवेश करता है तुम तनाव में आ जाते हो; चिंता तुरंत तुम्हारे भीतर प्रवेश कर जाती है। कैसे करें? क्या करें? सफल कैसे हों? असफलता से कैसे बचें? तुम पहले ही भविष्य में चले जाते हो।
यदि तुम विचार कर रहे हो, तो तुम क्या विचार कर सकते हो? तुम अज्ञात पर कैसे विचार कर सकते हो? तुम केवल ज्ञात पर विचार कर सकते हो। तुम इसे बार-बार चबा सकते हो, लेकिन यह ज्ञात है। यदि तुम जीसस के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; अगर तुम कृष्णा के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; तुम संशोधन, बदलाहट, सजावट किए जा सकते हो - लेकिन यह तुम्हें अज्ञात की ओर ले जाने वाला नहीं है। और "ईश्वर" अज्ञात है।
ध्यान मात्र होना है, बिना कुछ किए - कोई कार्य नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भाव नहीं। तुम बस हो। और यह एक कोरा आनंद है। जब तुम कुछ नहीं करते हो तो यह आनंद कहां से आता है? यह कहीं से नहीं आता या फिर हर जगह से आता है। यह अकारण है, क्योंकि अस्तित्व आनंद नाम की वस्तु से बना है। इसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम अप्रसन्न हो तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कारण है; अगर तुम प्रसन्न हो तो तुम बस प्रसन्न हो - इसके पीछे कोई कारण नहीं है। तुम्हारा मन कारण खोजने की कोशिश करता है क्योंकि यह अकारण पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि यह अकारण को नियंत्रित नहीं कर सकता - जो अकारण है उससे दिमाग बस नपुंसक हो जाता है। तो मन कुछ ना कुछ कारण खोजने में लग जाता है। लेकिन मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि जब भी तुम आनंदित होते हो, तो तुम किसी भी कारण से आनंदित नहीं होते, जब भी तुम अप्रसन्न होते हो, तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कोई कारण होता है - क्योंकि आनंद ही वह चीज है जिससे तुम बने हो। यह तुम्हारी ही चेतना है, यह तुम्हारा ही अंतरतम है। प्रसन्नता तुम्हारा अंतरतम है।
*************************************************************************************************
तो ध्यान क्या है? ध्यान है केवल स्वयं की उपस्थिति में आनंदित होना; ध्यान स्वयं में होने का आनंद है। यह बहुत सरल है - चेतना की पूरी तरह से विश्रांत अवस्था जहां तुम कुछ भी नहीं कर रहे होते। जिस क्षण तुम्हारे भीतर कर्ता भाव प्रवेश करता है तुम तनाव में आ जाते हो; चिंता तुरंत तुम्हारे भीतर प्रवेश कर जाती है। कैसे करें? क्या करें? सफल कैसे हों? असफलता से कैसे बचें? तुम पहले ही भविष्य में चले जाते हो।
यदि तुम विचार कर रहे हो, तो तुम क्या विचार कर सकते हो? तुम अज्ञात पर कैसे विचार कर सकते हो? तुम केवल ज्ञात पर विचार कर सकते हो। तुम इसे बार-बार चबा सकते हो, लेकिन यह ज्ञात है। यदि तुम जीसस के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; अगर तुम कृष्णा के बारे में कुछ जानते हो, तो तुम इस पर बार-बार चिंतन कर सकते हो; तुम संशोधन, बदलाहट, सजावट किए जा सकते हो - लेकिन यह तुम्हें अज्ञात की ओर ले जाने वाला नहीं है। और "ईश्वर" अज्ञात है।
ध्यान मात्र होना है, बिना कुछ किए - कोई कार्य नहीं, कोई विचार नहीं, कोई भाव नहीं। तुम बस हो। और यह एक कोरा आनंद है। जब तुम कुछ नहीं करते हो तो यह आनंद कहां से आता है? यह कहीं से नहीं आता या फिर हर जगह से आता है। यह अकारण है, क्योंकि अस्तित्व आनंद नाम की वस्तु से बना है। इसे किसी कारण की आवश्यकता नहीं है। यदि तुम अप्रसन्न हो तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कारण है; अगर तुम प्रसन्न हो तो तुम बस प्रसन्न हो - इसके पीछे कोई कारण नहीं है। तुम्हारा मन कारण खोजने की कोशिश करता है क्योंकि यह अकारण पर विश्वास नहीं कर सकता, क्योंकि यह अकारण को नियंत्रित नहीं कर सकता - जो अकारण है उससे दिमाग बस नपुंसक हो जाता है। तो मन कुछ ना कुछ कारण खोजने में लग जाता है। लेकिन मैं तुम्हें बताना चाहता हूं कि जब भी तुम आनंदित होते हो, तो तुम किसी भी कारण से आनंदित नहीं होते, जब भी तुम अप्रसन्न होते हो, तो तुम्हारे पास अप्रसन्नता का कोई कारण होता है - क्योंकि आनंद ही वह चीज है जिससे तुम बने हो। यह तुम्हारी ही चेतना है, यह तुम्हारा ही अंतरतम है। प्रसन्नता तुम्हारा अंतरतम है।
ध्यान की शुरुआत खुद को मन से अलग करने से होती है, एक साक्षी बनने से। खुद को किसी भी चीज से अलग करने का यही एकमात्र तरीका है। यदि तुम प्रकाश को देखते हो, स्वाभाविक रूप से एक बात निश्चित है: की तुम प्रकाश नहीं हो, तुम ही वह हो जो इसे देख रहे हो। यदि तुम फूल को देखते हो, तो एक बात निश्चित है: तुम फूल नहीं हो, तुम देखने वाले हो।
देखना कुंजी है ध्यान की:
अपने विचारों को देखो।
कुछ भी मत करो – कोई मंत्र नहीं दोहराना है, भगवान के नाम को नहीं दोहराना है- बस जो भी मन कर रहा है उसे देखो। उसे परेशान मत करो, उसे रोको मत, उसे दबाओ मत; अपनी ओर से कुछ मत करो। तुम केवल द्रष्टा बने रहो, और देखने का चमत्कार ही ध्यान है। जैसे ही तुम देखते हो, धीरे-धीरे मन विचारों से खाली हो जाता है, लेकिन तुम सो नहीं जाते हो, तुम अधिक होशपूर्ण होने लगते हो, और अधिक जागरूक होने लगते हो।
जैसे ही मन पूरी तरह से खाली हो जाता है, तुम्हारी पूरी ऊर्जा जागरण की एक लौ बन जाती है। यह लौ ध्यान का परिणाम है। तो तुम कह सकते हो कि ध्यान बिना किसी भी मूल्यांकन के देखने का, साक्षी का, निरीक्षण का दूसरा नाम है। मात्र देखकर, तुम तुरंत मन से बाहर आ जाते हो।
जो भी महर्षि महेश योगी और उनके जैसे अन्य लोग कर रहे हैं वह अच्छा है, लेकिन वे जिस किसी चीज को भी ध्यान का नाम दे रहें हैं वह ध्यान नहीं है। इसी बात पर वे लोगों को गुमराह कर रहे हैं। अगर वे ईमानदार और प्रामाणिक बने रहते और लोगों से कहते कि इससे आपको मानसिक स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य, एक बेहतर आरामदायक जीवन, और एक शांतिपूर्ण जीवन मिलेगा, तो यह सही होता। लेकिन एक बार जब उन्होंने इसे 'ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन' कह कर बुलाना शुरू किया, तो उन्होंने एक बहुत ही तुच्छ सी चीज को परम महत्व का बता दिया है जैसा कि बिलकुल भी नहीं है। लोग वर्षों से ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन करते आ रहे हैं, और पूर्व में तो हजारों वर्षों से ट्रान्सेंडैंटल मैडिटेशन कर रहे हैं। लेकिन यह उनका आत्म-ज्ञान नहीं बना है, और ना ही इससे वे गौतम बुद्ध हो गए हैं।
**********************************************************************************************
ध्यान क्या है?
ध्यान अ-मन की अवस्था है। ध्यान बिना किसी विचार के शुद्ध चेतना की स्थिति है। साधारणता, तुम्हारी चेतना, कचरे से बहुत अधिक भरी हुई है, बस धूल से ढके हुए दर्पण की तरह। मन एक निरंतर चलता ट्राफिक है: विचार चल रहे हैं, इच्छाएं चल रही हैं, स्मृतियां चल रही हैं, महत्वाकांक्षाएं चल रही हैं - यह रात-दिन निरंतर चलने वाला एक ट्राफिक है! यहां तक कि जब तुम सो रहे होते हो तो भी मन कोई न कोई काम कर रहा होता है, वह स्वप्न देख रहा होता है। वह अभी भी सोच रहा है; वह अभी भी चिंताओं और तनावों से भरा है। वह अगले दिन की तैयारी कर रहा है; अंदर ही अंदर तैयारी चल रही होती है।
यह गैर-ध्यान की अवस्था है - इसके ठीक विपरीत है ध्यान। जब कोई ट्राफिक नहीं होता और विचार रुक जाते हैं, कोई विचार नहीं चलते हैं, कोई इच्छा तुम्हें डगमगाती नहीं है, तुम पूरी तरह से मौन होते हो - वह मौन ही ध्यान है। और उस मौन में सत्य जाना जाता है, अन्यथा कभी नहीं। ध्यान अ-मन की अवस्था है।
और तुम मन के द्वारा ध्यान को नहीं पा सकते क्योंकि मन स्वयं को टिकाए रखेगा। तुम मन को अलग रखकर ही ध्यान को पा सकते हो, इसके प्रति शांत, उदासीन और स्वयं को उससे दूर हटाकर; मन को गुजरता देखकर, लेकिन इसके साथ बिना कोई तादात्म्य बनाए, बिना यह सोचे कि "यह मैं हूं।"
ध्यान एक बोध है कि "मैं मन नहीं हूं"। जब यह बोध तुम्हारे भीतर गहरा और गहरा हो जाता है, धीरे-धीरे कुछ क्षण आते हैं - मौन के क्षण, शुद्ध रिक्तता के क्षण, पारदर्शिता के क्षण ऐसे क्षण जब तुम्हारे भीतर कोई हलचल नहीं और सब कुछ ठहरा हुआ होता है। उन ठहरे हुए क्षणों में तुम जान लोगे कि तुम कौन हो, और तुम्हें पता चलेगा कि इस अस्तित्व का क्या रहस्य है।
**************************************************************************************
ध्यान क्या है? क्या यह कोई तकनीक है जिसका अभ्यास किया जा सकता है? क्या यह कोई प्रयास है जिसे तुम्हें करना है? क्या यह ऐसा कुछ है जिसे मन हासिल कर सकता है? ऐसा नहीं है।
जो कुछ भी मन कर सकता है वह ध्यान नहीं हो सकता - यह कुछ ऐसा है जो मन के पार है, यहां मन बिल्कुल असहाय है।
मन ध्यान में प्रवेश नहीं कर सकता, जहां मन समाप्त होता है, वहां ध्यान आरंभ होता है। इसे स्मरण रखना होगा, क्योंकि हमारे जीवन में, हम जो भी करते हैं, हम मन के द्वारा करते हैं; जो भी हम प्राप्त करते हैं, हम मन के द्वारा करते हैं।
और फिर, जब हम भीतर की ओर मुड़ते हैं, हम फिर से तकनीक, विधि, क्रिया के अनुसार सोचना शुरू कर देते हैं, क्योंकि पूरे जीवन का अनुभव हमें दिखाता है कि सब कुछ मन से किया जा सकता है। हां - ध्यान को छोड़कर, सब कुछ मन के द्वारा किया जा सकता है।
ध्यान को छोड़कर सब कुछ मन से किया जाता है। क्योंकि ध्यान एक उपलब्धि नहीं है – ऐसा पहले से ही है, यह तुम्हारा स्वभाव है। इसे हासिल नहीं करना है; इसे समझना ही नहीं, इसे स्मरण भर रखना है। यह तुम्हारे लिए प्रतीक्षारत है – बस भीतर की और लौटना, और यह उपलब्ध है। तुम हमेशा-हमेशा से इसे साथ लिए हुए हो।
ध्यान तुम्हारा आंतरिक स्वभाव है। वह तुम हो, वह तुम्हारी आत्मा है, इसका तुम्हारे कर्मों से कोई लेना-देना नहीं है। इसे तुम हासिल नहीं कर सकते। इस पर कब्जा नहीं हो सकता, यह कोई वस्तु नहीं है।
यह तुम हो। यह तुम्हारा होना हैै।
हम जिस ध्यान की बात कर रहें हैं वह किसी का ध्यान नहीं है: ध्यान की एक अवस्था है। अवस्था का मतलब ये है ध्यान का मतलब किसी को स्मरण में लाना नहीं है। ध्यान का मतलब जो सब हमारे स्मरण में है उनको गिरा देना है। और एक स्थिति लानी है कि केवल चेतना मात्र रह जाए, केवल जागरूकता मात्र रह जाए।
यहां हम एक दिया मात्र जलाएं और यहां से सारी चीजें हटा दें तो भी दिया प्रकाश करता रहेगा। वैसे ही अगर हम चित्त से सारे विचार हटा दें, चित्त से सारी कल्पनाएं हटा दें तो क्या होगा? जब सारे विचार, सारी कल्पनाएं हट जाएंगी तो क्या होगा? चेतना अकेली रह जाएगी। चेतना की वो अकेली अवस्था ध्यान है। ध्यान किसी का नहीं करना होता है, ध्यान एक अवस्था है जब चेतना अकेली रह जाती है।
जब चेतना अकेली रह जाए और चेतना के सामने कोई विषय न हो उस अवस्था का नाम ध्यान है। मैं ध्यान का उसी अर्थ में प्रयोग कर रहा हूं।
जो हम प्रयोग करते हैं वो ठीक अर्थों में ध्यान नहीं धारणा है; ध्यान तो उपलब्ध होगा उसके द्वारा जो हम प्रयोग कर रहे हैं। समझ लें रात्रि में हमने प्रयोग किया चक्रों पर, सुबह हम प्रयोग करते है स्वांस पर ये सब धारणा हैं, ये ध्यान नहीं हैं। इस धारणा के माध्यम से एक घड़ी आएगी की स्वांस भी विलीन हो जाएगी। इस धारणा के माध्यम से एक घड़ी आएगी की शरीर भी विलीन हो जाएगा, विचार भी विलीन हो जाएंगे। जब सब विलीन हो जाएगा तो क्या शेष रहेगा? जो शेष रहेगा उसका नाम ध्यान है।
अप्सरा साधना और नियम
आज हम अप्सरा साधना तथा उसके नियम की बात करेगे ये सब जानकारी आपको सिर्फ ज्ञान बढाने के उद्देश्य से दिया जा रहा है. प्रत्येक धर्म मे यह कहा जाता है कि स्वर्ग मे जाने वालो को भोगविलास तथा दिव्यसुख की प्राप्ती होती है. अप्सराये उनका मनोरंजन करती है. यूनानी शास्त्रो मे अप्सराओ को "निफ" नाम से जाना जाता है. ये अत्यंत रूपवती और दिव्य शक्तियो से संपन्न होती है. इन अप्सराओ को इस्लाम मे "हूर" कहा गया है. इनका कार्य नृत्य, गायन, वादन कर सबका मनोरंजन करना होता है. ये अत्यंत खूबसूरत तथा भरपूर यौवन से भरी हुयी षोडस वर्षीया अप्सरा होती है. षोडस वर्षीया का अर्थ है कि १६ वर्ष के ऊपर न हो. इनके शरीर से निकलने वाली खुशबू लोगो को आकर्षित करती रहती है. ये अगर साधक के ऊपर प्रसन्न हो जाय तो उनको कभी धोखा नही देती और भरपूर सुख प्रदान करती रहती है. इसके अलावा इन्हे रिषी-मुनी की तपस्या को भंग करने के लिये भी भेजा जाता था. इनमे से प्रमुख अप्सराओ के नाम है रंभा, मेनका, तिलोत्तमा, उर्वशी. देखा जाय तो हमारे भारतीय समाज मे अप्सराये रूप और सौंदर्य की पर्याय बन चुकी है.
अब हम जानना चाहेगे कि इनकी साधना इस कलियुग मे लोग क्यो करते है?
जब भी कोई ब्यक्ति किसी देवी-देवता, यक्ष, गंधर्य, अपसरा की साधना करता है तो उनके गुण उस साधक मे आने शुरु हो जाते है जैसे कि...
अगर हम माता लक्ष्मी की साधना करते है तो लक्ष्मी के गुण जैसे बुद्धी का सही उपयोग, सही समय मे सही निर्णय लेना, भौतिक सुख, ब्यापार मे बृद्धी ईत्यादि गुण होने की वजह से यही गुण साधक को भी मिलने लगते है.
हनुमान की साधना करते है तो उनके गुण जैसे आत्मविश्वास, पराक्रम, शक्ति, विजय तथा ब्रम्हचर्य जैसे गुण होने की वजह से साधक को भी वही गुण मिलने लगते है.
इसी तरह से अप्सरा की साधना करने से उनके गुण जैसे कि रूप, सुंदरता, यौवन, हमेशा आनंद मे रहना, सौंदर्य, सम्मोहन, आकर्षण, हमेशा जवान दिखना ईत्यादि गुण होने की वजह से वही गुण साधक मे भी आने लगते है. इसीलिये आज के युग मे अप्सरा की साधना स्त्री तथा पुरुष करने लगे है.
आईये जानते है क्या क्या लाभ मिलते है इस अप्सरा साधना से....
- स्त्री तथा पुरुष मे आकर्षण शक्ति बढ जाती है
- पुरुषो मे यौन क्षमता बढ जाती है
- स्त्रियो को भरपूर यौवन की प्राप्ति होती है.
- आपकी बातो मे या हाव-भाव जबर्दस्त आकर्षण छुपा रहता है.
- यह एंटी-एजिंग शक्ति प्रदान करता है यानी उम्र का प्रभाव शरीर पर कम होता है.
- आपको सुंदर, आकर्षक दिखने मे मदत करता है.
- हीन-भावना दूर कर आत्मविश्वास को बढाता है.
- यौन क्षमता मे बृद्धी
- यौन समस्या मे लाभ
- गुप्त अंग की समस्या से लाभ
- ठंडेपन की समस्या से लाभ
- शरीर मे आनंद, चेतना तथा स्फूर्ति बनी रहती है.
- कला के क्षेत्र कार्य करने वालो के लिये ये साधना बहुत ही लाभकारी है.
अप्सरा साधना के नियम
- अप्सरा साधना स्त्री पुरुष कोई भी संपन्न कर सकता है.
- १८ वर्ष से लेकर ६०-७० वर्ष तक के ब्यक्ति अप्सरा साधना कर सकते है.
- ये साधना किसी के मार्ग-दर्शन मे ही करे.
- आखे बंद कर मंत्र जप करे
- किसी जानकार गुरु से दिक्षा अवश्य प्राप्त कर ले.
- इनकी साधना बीच मे न छोडे.
- स्त्रियो को मासिक धर्म के कारण ३ दिन की छूट होती है.
- साधना एक निश्चित समय पर ही शुरु करे. १०-१५ मिनट आगे पीछे चल जाता है.
- साधना मे उपांशु जाप का प्रयोग करे यानी बुदबुदाकर जाप करे और आपके होठ हिलते रहने चाहिये.
- जल्दबाजी न करे. साधना जितने दिन की बताई गयी है उतने दिन अवश्य करे.
- कुछ साधको को बीच मे ही ऐसा लगता है कि साधना सफल हो गयी है इसलिये साधना रोके नही. अप्सराये परिक्षा भी लेती रहती है.
- साधना के प्रति पूर्ण विश्वास होना जरूरी है
- साधना के दौरान अपनी कामेच्छा पर नियंत्रण रखे. साधना मे वासना का कोई स्थान नही है इसलिये मन पर नियंत्रण रखे.
- कई साधक अप्सराओ के साथ शारीरिक संबंध की कल्पना भी करने लगते है. इसलिये ऐसी भावनाओ से बचे क्योकि ऐसी भावनाये साधना को असफल बनाती है.
- साधना के दौरान खुशबू आने का अहसास होता है
- किसी को अपने आस-पास चलने का अहसास होता है. कुछ भी हो अपनी आख न खोले.
- कहा जाता है कि जब तक अप्सरा द्वारा वचन न दिया जाय तब तक उसकी बातो पर विश्वास न करे.
Friday, October 4, 2019
ओशो – अपनी नींद में ध्यान कैसे करें
धीरे-धीरे ध्यान तुम्हारे संपूर्ण जीवन में व्याप्त हो जाना चाहिए। यहां तक की सोने के लिए जाते समय भी।
बिस्तर पर लेटने पर कुछ ही मिनटों में तुम नींद की गोद में चले जाओगे। इन कुछ मिनटों में मौन, अँधेरा और विश्रांत शरीर इनके संबंध में सजग रहो। जब तक पूरी तरह से नींद न आ जाए तब तक ऊँघते समय सजग रहो और तुमको आश्चर्य होगा। जब तक पूरी तरह नींद आती है तब तक के अंतिम क्षण तक यदि तुम ऐसा अभ्यास जारी रखते हो तो फिर सुबह में भी पहला विचार सजगता के संबंध में ही होगा। सोते समय जो तुम्हारा अंतिम विचार होगा वही सुबह में जागने पर पहला विचार होगा क्योंकि तुम्हारी नींद के दौरान यह अंतर-प्रवह के रूप में जारी रहता है।
ध्यान के लिए किसी के पास समय नहीं है—दिन में बहुत व्यस्तता रहती है। लेकिन रात के छह आठ घंटों को ध्यान में बदला जा सकता है। तुम पानी से नहाते हो। ऐसा तुम सजगता के साथ क्यों नहीं करते हो? रोबट की तरह यांत्रिक रूप से क्यों? तुम ऐसा हर रोज करते हो। इसलिए तुम करते जाते हो। और यह यंत्रवत हो जाता है। हर काम जीवंत होकर करो। धीरे-धीरे तुम्हारा संपूर्ण दिन, चौबीसों घंटे ध्यान से भर जाएगा। तभी तुम सही मार्ग पर हो। तब तुम्हें सफलता मिलने की पूरी गारंटी है।
- रात को बत्ती बुझा दो, बिस्तर पर बैठ जाओ। और ‘ओ’ ध्वनि करते हुए मुंह से गहरी श्वास छोड़ो। पूरी तरह से श्वास छोड़ने के बार एक मिनट के रूक जाओ। न तो श्वास लो और न ही छोड़ो—केवल रूक जाओ। इस ठहराव में तुम कुछ भी नहीं कर रहे हो। श्वास भी नहीं ले रहे हो।
केवल एक क्षण के लिए उस ठहराव में रहो। और साक्षी बनो। देखो कि क्या हो रहा है। सजग रहो कि तुम कहां हो। उस ठहराव के एक क्षण में संपूर्ण परिस्थिति का साक्षी बनो। वहां समय नहीं रहता। क्योंकि समय श्वास के साथ चला जाता है। तुम श्वास लेते हो इसलिए तुम महसूस करते हो कि समय बीत रहा है। समय रूक गया है तो सब कुछ रूक गया है…उस ठहराव में तुम अपने अंतस और ऊर्जा के गहनत्म स्त्रोत के प्रति सजग हो सकते हो। - तब नाक से श्वास लो, श्वास लेने के लिए अतिरिक्त प्रयास मत करो। श्वास छोड़ने के लिए ही पूरा प्रयास करो। तुमने श्वास छोड़ दिया, फिर एक क्षण के लिए रूक जाओ, तब शरीर को श्वास लेने दो। तुम केवल शरीर पर ध्यान दो। और जब शरीर श्वास लेगा तब तुम अपने चारों और एक गहन मौन महसूस करोगे। क्योंकि तब तुम जानोंगे कि जीवन के लिए प्रयास करने की आवश्यकता नहीं है। जीवन स्वयं श्वास लेता है। जीवन स्वयं अपने तरीके से चलता है। यह एक नदी है। तुम इसमें अनावश्यक ही वेग उत्पन करने का प्रयास करते हो।
- तुम देखोगें कि शरीर श्वास लेता है। इसमें तुम्हारे प्रयास की आवश्यकता नहीं है। इसमें तुम्हारे अहं की आवश्यकता नहीं—तुम्हारी आवश्यकता नहीं। तुम केवल एक साक्षी हो जाते हो। तुम केवल शरीर को श्वास लेते देखते हो। गहन मौन की अनुभूति होगी। शरीर में पूरी तरह श्वास भर जाने पर एक क्षण के लिए फिर से रूक जाओ। फिर गौर करो।
ये दोनों क्षण एक दूसरे से बिलकुल भिन्न है। जिन्होंने जीवन की आंतरिक प्रक्रिया को देखा है वे गहराई के साथ कहते है कि प्रत्येक बार श्वास लेने के साथ तुम जन्मते हो और प्रत्येक श्वास छोड़ने के साथ तुम मरते हो। प्रत्येक क्षण जन्म लेते हो। एक बार तुम जान लेते हो कि यह जीवन है और यह मृत्यु है। तब तुम इन दोनों से पार हो जाते हो। साक्षी होना न तो जीवन है और न ही मृत्यु। साक्षी न तो कभी जन्म लेता है और न ही कभी मरता है। केवल शरीर मरता है। केवल कायित संरचना समाप्त होती है। - इसी रात बीस मिनट तक इस ध्यान को करो और फिर सो जाओ। सुबह जब तुम महसूस करो कि नींद तुम्हें छोड़ कर चली गई है तब तुरंत अपनी आंखें मत खोलों। जब नींद तुम्हें छोड़ देती है और जीवन ऊर्जा तुम्हारे अंदर जगने लगती है तब तुम उसे देख सकते हो। ध्यान की गहराई में जाने के लिए यह देखना सहायक होगा।
- रात भर के विश्राम के बाद मन ताजा है, शरीर ताजा है; सब कुछ तरोताजा है। भारहीन है। कोई धूल नहीं, थकान नहीं—तुम गहराई से गौर से देखते हो। तुम्हारी आंखें स्वच्छ है। सब कुछ जीवंत है। इस क्षण को मत गंवाओ। नींद से जागरण में बदलने वाली ऊर्जा को महसूस करो। ध्यान से देखो।
- तीन मिनट तक अपने शरीर को बिल्ली की तरह खींचो—लेकिन आंखें बंद करके। अंतस से शरीर को देखो। खींचो, आगे बढ़ो और ऊर्जा को प्रवाहित होने दो। तथा इसे महसूस करो। जब यह तरोताजा रहता है। तब इसे महसूस करना अच्छा है। यह अनुभूति पूरे दिन तुम्हारे साथ रहेगी।
- इसे दो तीन मिनट तक करो। यदि तुम्हें आनंद आ रहा है तो पाँच मिनट तक। और तब दो-तीन मिनट तक पागल की तरह जोर से हंसों, लेकिन आंखे मूंदकर। ऊर्जाऐं प्रवाहित हो रही है। शरीर सजग, सचेत और जीवंत है। नींद जा चुकी है। तुम नई ऊर्जा से भर जाते हो।
- पहला काम हंसना है क्योंकि यह दिन भर की गतिविधि तय करता है। यदि तुम ऐसा करते हो तो तुम महसूस करोगे कि तुम खुशमिजाज रहते हो। तुम्हारा पूरा दिन आनंदमय रहता है। दूसरे क्या कहेंगे उसकी परवाह मत करो। हंसों ओर उन्हें हंसने में मदद करो।
याद रखो कि दिन के पहले काम से दिन की दूसरी गतिविधि तय होती है। और रात का अंतिम काम भी रात की रूप रेखा तय करता है। इसलिए सोते समय विश्रांत रहो और जब जागों तो हंसते हुए जागों। हंसना दिन की पहली प्रार्थना बने। हंसी महन स्वीकृति दिखाता है। हंसी उत्सव दिखाता है। हंसी दिखाता है कि जीवन अच्छा है।
सुबह का पहला काम यह है कि शरीर की बिल्ली की तरह खींचो और फिर हंसों, और इसके बाद ही बिस्तर छोड़ो। पूरा दिन अलग तरह से गुजरेगा।
ध्यान की वैज्ञानिक विधि ध्यान :"मैं यह नहीं हूं'
मन कचरा है! ऐसा नहीं है कि आपके पास कचरा है और दूसरे के पास नहीं है। मन ही कचरा है। और अगर आप कचरा बाहर भी फेंकते रहें, तो जितना चाहे फेंकते रह सकते हैं, लेकिन यह कभी खतम होने वाला नहीं है। यह खुद ही बढ़ने वाला कचरा है। यह मुर्दा नहीं है, यह सकि"य है। यह बढ़ता रहता है और इसका अपना जीवन है, तो अगर हम इसे काटें तो इसमें नई पत्तियां अंकुरित होने लगती हैं।
तुम कहीं भी इसका प्रयोग कर सकते हो। तुम स्नान कर रहे हो; अचानक अपने को कहो: स्टॉप! अगर एक क्षण के लिए भी यह एकाएक रुकना घटित हो जाए तो तुम अपने भीतर कुछ भिन्न बात घटित होते पाओगे। तब तुम अपने केंद्र पर फेंक दिए जाओगे। और तब सब कुछ ठहर जाएगा। तुम्हारा शरीर तो पूरी तरह रुकेगा ही, तुम्हारा मन भी गति करना बंद कर देगा।
कभी एक छोटा प्रयोग करें...चौबीस घंटे के लिए 'मैं' को केंद्र से हटा दें, सिर्फ चौबीस घंटे के लिए; 'तू' को केंद्र पर रख लें। सिर्फ चौबीस घंटे के लिए सतत स्मरण रखें कि 'तू'। जब पैर में पत्थर लग जाए, तब भी; जब कोई गाली दे जाए, तब भी; जब कोई अंगारा फेंक दे ऊपर, तब भी; जब कोई फूल की माला डाले, तब भी; जब कोई चरणों में सिर रख दे, तब भी--चौबीस घंटे के लिए स्मरण रख लें कि मैं नहीं हूं केंद्र पर, 'तू' है। तो आपकी जिंदगी में एक नये अध्याय का प्रारंभ हो जाएगा। अगर चौबीस घंटे यह स्मरण संभव हो सका, अगर पूरा न भी हुआ, चौबीस घंटे में चौबीस मिनट भी पूरा हो गया, तो आप वही आदमी दुबारा नहीं हो सकेंगे; क्योंकि
तुम कहीं भी इसका प्रयोग कर सकते हो। तुम स्नान कर रहे हो; अचानक अपने को कहो: स्टॉप! अगर एक क्षण के लिए भी यह एकाएक रुकना घटित हो जाए तो तुम अपने भीतर कुछ भिन्न बात घटित होते पाओगे। तब तुम अपने केंद्र पर फेंक दिए जाओगे। और तब सब कुछ ठहर जाएगा। तुम्हारा शरीर तो पूरी तरह रुकेगा ही, तुम्हारा मन भी गति करना बंद कर देगा।
कभी एक छोटा प्रयोग करें...चौबीस घंटे के लिए 'मैं' को केंद्र से हटा दें, सिर्फ चौबीस घंटे के लिए; 'तू' को केंद्र पर रख लें। सिर्फ चौबीस घंटे के लिए सतत स्मरण रखें कि 'तू'। जब पैर में पत्थर लग जाए, तब भी; जब कोई गाली दे जाए, तब भी; जब कोई अंगारा फेंक दे ऊपर, तब भी; जब कोई फूल की माला डाले, तब भी; जब कोई चरणों में सिर रख दे, तब भी--चौबीस घंटे के लिए स्मरण रख लें कि मैं नहीं हूं केंद्र पर, 'तू' है। तो आपकी जिंदगी में एक नये अध्याय का प्रारंभ हो जाएगा। अगर चौबीस घंटे यह स्मरण संभव हो सका, अगर पूरा न भी हुआ, चौबीस घंटे में चौबीस मिनट भी पूरा हो गया, तो आप वही आदमी दुबारा नहीं हो सकेंगे; क्योंकि
Subscribe to:
Posts (Atom)



